ओ मजदूर… तेरा दर्द कोई ना समझ पाता है
सूखी रोटी को आँसू में डुबो के खाता है फिर भी बच्चों से हँस के कह जाता है “आज कुछ ख़ास है…” ओ मजदूर… तेरा दर्द कोई ना समझ पाता है सूरज सर पे लोहा बन के तपता है वो पसीने की बूंदों को गिनता है हाथ फटे हैं, छाले हुए हैं फिर भी हथौड़ा ज़ोर से चलाता है बेटी माँगे नई जूती बाबा से वो टूटी चप्पल सी के चुप हो जाता है ओ ओ… सूखी रोटी को आँसू में डुबो के खाता है फिर भी बच्चों से हँस के कह जाता है “आज कुछ ख़ास है…” शाम को घर लौटे तो थक के चूर-चूर बीवी की आँखों में सवाल है भरपूर बच्चे सो जाएँ तो चुपके से रो लेता है तकिये को गले लगा के बिलखता है सपने में भी वो बोरी उठाता है नींद में भी मालिक की डाँट सुनता है ओ ओ… सूखी रोटी को आँसू में डुबो के खाता है फिर भी बच्चों से हँस के कह जाता है “आज कुछ ख़ास है…” ओ मजदूर… तेरा दर्द कोई ना समझ पाता है एक दिन जब उसकी आह निकलेगी ये ईंटें रोएंगी, ये सड़कें चीखेंगी महल हिलेंगे, नींव काँप जाएगी उसके एक आँसू में सारी कायनात समायेगी . ओ ओ… सूखी रोटी को आँसू में डुबो के खाता है फिर भी बच्चों से हँस के कह जाता है “कल कुछ ख़ास होगा… बस एक दिन और सह लेंगे…” ओ मजदूर… तेरा दर्द कोई ना समझ पाता है कोई ना समझ पाता है…
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