कुण्डलिया
अर्पण अर्पण यह निःस्वार्थ है, इसे करो स्वीकार। मुझे मात्र यह लालसा,प्रभु अब लो अवतार।। प्रभु अब लो अवतार, जगत से पाप मिटाओ। मिटे सभी संताप, अमन को भू पर लाओ।। सुनो निवेदन ईश, करूँ मैं सबकुछ तर्पण। धरा बने अब स्वर्ग, करो स्वीकार समर्पण।। मेरे अवगुण प्रभु हरो, हो उर पावन शुद्ध। कृपा भक्त पर कीजिए, बने नरेंद्र प्रबुद्ध।। बने नरेंद्र प्रबुद्ध, भव्य हो जीवन दर्पण। रहकर तुझमें लीन,करूँ मैं पूर्ण समर्पण।। मुझे मिले आशीष, गहूँ मैं आश्रय तेरे। निकट रहूँ बन खास, हरो अब दुर्गुण मेरे।। करता अर्पण आपको, जो है मेरे पास। पैसा धन बेकार है,प्रभु पर हो विश्वास।। प्रभु पर हो विश्वास, ईश हैं सबके पालक। सदा जपो जगदीश, यही हैं संकट घालक।। दौलत संग्रह व्यर्थ, भक्त क्यूँ रहता डरता। प्रभु जब तेरे साथ, वही तो पालन करता।। नरेंद्र सिंह,21.05.2025
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