🌳समर्पित🌳
ये जो पत्ते कैसे हिलते हैं जब बहार आती है तो, फूल कैसे खिलते हैं ! कितने आनंद है इनके जीवन में कभी गाते हैं तो, कभी नाचते हैं । कैसे अपने आप में मदमस्त होते हैं दूसरों के वास्ते अपने को, सदा अर्पण करते हैं । द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार हैं क्या नहीं समझते वे न जाति-न धर्म के बारे में सोचते जो भी आये जैसे भी आये अपने को समर्पित करते वे । जानते हैं सिर्फ इतना यह जो जीवन, जीने के लिए नहीं अपने आपको, दूसरों के हित के खातिर जान देने के लिए सही । पर ये जो मानव, इसका जीवन क्या है !!! जीता है जीवन अपने खातिर मिटाता हैं दूसरों को अपने स्वार्थ के खातिर । वाह ! मानव वाह ! तू कितना सयाना है तू तो द्वेष का खजाना है ये पेड़-पौधे तेरे बिन बेगाना है !!!
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