मैं टूट गई हूँ,
यूँ उम्मीद टूटते टूटते, बाद इसके ज़िम्मेदारी निभाते, सिसकियों को रोकते रोकते, दर्द यूँ सहते सहते, आम से खास बनते फिर खुद वो ख़ाक में देखते, हाँ यूँ अकेलापन सहते सहते, मैं टूट गई हूँ। मुड़कर पीछे देखते देखते, आगे नहीं बढ़ते, खड़ी की खड़ी वहीं हालातों में जकड़े जकड़े, खुद को खुद का गुनहगार कहते सुनते, बेइज्जती का लांछन सहते सहते, मैं टूट गई हूँ। रस्म रिवाज ये बंधन, कालिख की चादर ओढ़ते, नारी हुई जैसे गाली अब, मैं अपना दामन खींचते, जीने दो ज़िंदगी एक पल, भीख सबसे माँगते, साँसों से भी घुटन की कीमत चुकाते, मैं टूट गई हूँ। ख़ुद से बेहतर वैश्या को पाते, बेवजह यूँ खुद को सजाते, समझते हुए खुद को, हर क़दम खुद को समझाते, आँखों के पानी का दर्द में बहते सुखते जाते, मैं जिल्लत में यूँ खुद को पाते, मैं टूट गई हूँ।
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