निराकार
हर तरफ है तेरा तरन्नुम, हृदय में बसेरा, पलकें भिगायों अब, ब-शहर पूछता हूँ। भटकता रहा अनुरागी,दिन में दिवाकर, जल रहा है पग मेरा,दो-पहर पूछता हूँ। एहसास है मुझको तू ह्रदय में निवास हो, अंजान मै स्वंय से वजर शजर पूछता हूँ। पाताल हो या जलद पुकार मेरी सुन लो, काल की घड़ी रूक,कुछ ठहर पूछता हूँ। तुम शाश्वत, निराकार हो, जीवन सार हो, मै धूमिल,अज्ञात, ये मन लहर पूछता हूँ। हे गगन,सारंग,कपोल दृष्टि गड़ाये बैठा हूँ, व्योम में श्वेत प्रकाश,नित संवर पूछता हूँ। मृग नयन में दृश्यमान,कौन हो आधार में? साकार, निराकार में बहर-बहर पूछता हूँ। व्याप्त करों आकार को, उर में निवास दो, बारम्बार शून्य हो अदृश्य अधर पूछता हूँ। -----संतोष शर्मा नूतन एवं मौलिक रचना कुशीनगर (उoप्र)
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