मैं तो राम तेरे चरणदास हूँ
भला मैं कहाँ जाऊं,तजकर तेरे इस चरण को; भला आपसे श्रेष्ठ कौन है,इस जग में वरण को। पतित-पावन सिर्फ आप ही हैं तीनों लोक में; दीन-हीन का दुःख आप ही हरते,हर शोक में। आपने चुन-चुनकर पतितों का उद्धार किया है, भला कौन जो आप जैसा,ऐसा कार्य किया है। निषादराज तर गया था,आपको नदी पार कर; मुनियों के यज्ञ पूर्ण किए,राक्षसों को मारकर। पत्थर बनी अहिल्या को आपने ही तो तारा था; शबरी के जूठे बेर खा,उसके भाग्य संवारा था। बानरों को साथ ले,उसके कर्मो को सराहा था; जटायु को मुक्ति दिए,जिसे न कोई सहारा था। सुग्रीव और बिभीषन से मैत्री अटूट निभाया था; दुष्ट बाली व रावण को मार,इन्हें गद्दी बैठाया था ऐसे भक्तवत्सल को छोड़,और किसको मैं भजूँ; तारनहार प्रभु राम को,आखिर क्यों कर मैं तजूँ। मैं क्यों जाऊं किसी देव और मनुज की शरण में; हे प्रभु !मुझे तो पड़े रहना है सिर्फ तेरे चरण में। नरेंद्र सिंह 20.01.2024
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