एक नाव
नाव चली है एक सागर लांगने को , हवाओं के संग धुंधली सी सुबह तराशने को । रेत की सिलवटों पर चमके कुछ सूरज की किरण, सपनो की डोरी को कुछ बाँधती सवारती । सागर की गहराई को नापने का मन है , हर लहर पे अनकही कहानी के लफ्ज़ है । छुपे मोती बिखरी रेत , अनदेखे रहे गए मन के नैन । नाविक हु मैं आँखों में समुन्दर है , हाथों में पकड़ी हर सांस की एक डोर है। हर लहर में उठते नए सवाल है , नापनी गहराई है या सागर को समझना है । सागर भी कहेता हैं हुँ मैं अनंत बस तू चल मेरे संग । गहराई में छुपी सुकून की एक रीत है चलती हुई नाव को मिलती कही जीत है । अंत में नाव जब किनारे पौह्चती है , समुन्दर के किनारे वह यूँ ही ठहरती है। सवालो के जवाब नहीं बस एक सुकून की नाव चलती है , एक सागर लांगने को या फिर गहराई नापने को ।।
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