चाय की चाह में
चाय की चाह में, दो दोस्त भटके अनेकों राह में। चाय की ऐसी लगी थी तलब, घंटों घूमे घर अलग अलग। एक ही ख़्वाइस बस दो चाय की प्याली, पहले घर गए , वहां था गैस सिलेंडर खाली। फिर भटके इधर उधर , जा पहुंचे दूसरे घर। सोचा मिलेगी चाय यहीं कहीं, वहां पता चला की चाय पत्ती है नहीं। तीसरे घर खुशी की लहर सी आई, वहां भरा पड़ा था चाय पत्ती का जार, भाई साहब ने खुशियां छीनी , कहकर , भाभी जी गई है बाज़ार। चल पड़े आगे गति थी मंद मंद, रविवार का दिन, सारी दुकानों थी बंद। भटकते रहे पूरा दिन भर, आखिर में दोस्त ले गया अपने घर। दोस्त ने अपनी कंजूसी दूर भगाई, फ्रिज से एक दूध की थैली उठाई, अदरक डालकर मस्त चाय बनाई, खुद ने भी पी और एक कप मुझे भी पिलाई। आप सबको यही है मेरी राय, जब भी मन में आए, अपने आप बनाओ चाय।
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