प्रेम की आशा
मैं शब्द लिखूं अपने मन के तुम भाव मेरे पढ़ पाओ ना .. मैं तुमको हृदय बताती हूँ तुम भी मुझे मोह बताओ ना तुम सरस प्रेम की सोम नदी मैं झरने सी बस व्याकुल हूं तुम मेरे इस खारे जल को, सोम नदी में मिलाओ ना .. तुम प्रेम राग मैं वीर राग, फिर भी ना मिलन असंभव है, तुम अपने कुछ प्रेम राग मुझको भी दे जाओ ना... हाँ माना की ये कलयुग है, पर तुम पर है विश्वास मुझे, तुम काव्य का मान मेरे रख कर सतयुग सा प्रेम निभाओ ना.....
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