सरसी छंद( गीत)
परिमल प्रेम विधान। चढ़े कदम यमुना तट कान्हा, लेकर वेणु निशान। ध्यानस्थ हो मुरली बजावें, परिमल प्रेम विधान।। प्यारे कान्हा वेणु बजावें, नाचे नन्हें ग्वाल। बालक करते ता-ता थैया, झूमें दे-दे ताल।। निर्निमेष वहाँ सुरभि टोली, तके करुणा निधान। ध्यानस्थ हो मुरली बजावें, परिमल प्रेम विधान।। दौड़ी-दौड़ी आई राधा, कृष्ण हुए हैरान। चीख पड़ी तब वृन्दा रानी, बन्द करो ये तान।। लोक-लाज सब खोकर आई, होते अभी विहान । ध्यानस्थ हो मुरली बजावें, परिमल प्रेम विधान।। हाथ जोड़ कर कहती राधा, करो नहीं बदनाम। सुनकर निनाद इस मुरली का, उर होता नाकाम ।। कान्हा सुन लो विनती मेरी, कुछ तो करो निदान। ध्यानस्थ हो मुरली बजावें, परिमल प्रेम विधान।। नरेन्द्र सिंह, 24.06.2025
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