मैंने तुम्हें जब जब देखा
मैंने तुम्हें जब जब देखा, खुले हुए केशों में देखा। माथे पर बिंदी सजाए, एक हल्की मुस्कान के साथ देखा। लगाकर आंखों में काजल चमकती हैं तुम्हारी आँखें, मैं ना जाने कितनी बार उनमें खुद को गिरते देखा। खुलें आसमान में, जब भी तारों को टिमटिमाते देखा, हाँ, तेरे ही ख्यालों में खोकर, मैंने तुम्हें ही देखा। दूर रोशनी से नहाए, चाँद को जब भी देखा, तुम्हारी मुस्कान को, अपनी आँखों में देखा। ना जाने क्यों मन मेरा, हर बार बेचैन हो उठता है, ढलती शाम में जब भी, तुम्हें ख्यालों में आते देखा, एक हसीन रूप ही देखा। मन मुझसे कहता है, कैसा नाता है तुमसे, जब भी तुम्हें खुले केशों में देखता हूँ, ?
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