अंत है अनन्त भ्रष्टाचार
खड़े सब कतार में, देख कतार लंबी आई, अन्न खाए मंत्री, तरसे खाय किसान, जहां जाते सब एकही मांगे, बिन दिए न काम हुआ। जब देख सब मांगता दिखत, बिन मांगे न पाए ,जैसे तैसे काम हुआ। काम करवाना जल्दी चाहते, दे भर, आह तक निकल न पाई हो दानी तो सोचो फिर, वरना कहा ऐसा काम हुआ बस अंत है अनन्त भ्रष्टाचार । एक बात है आंखों देखी ,खड़े सब हैं कतार संभाले, इतने मे पहुंचे कुछ खास, खड़े हजार यूं देख रहे, इतनी न देखी बड़ी कतार, आए पहुंच , दिए कुछ खोया दाम, कतार है देख रही , आगे पहुंचे। देख देख गया पीछे का आगे, यह सब थी दान की कमाल, इतना तो चलता फिरता, बस अंत है अनन्त भ्रष्टाचार । एक बार फिसली चप्पल, चाहे बार बार फिसलना तनिक बारिश से भीगे नही, अशाह्यय रहा वह मानव ,जिसे दिया न जाता है माना बड़ा पैसा है, बेचा अपना ईमान है, लोग क्या कहते, क्या करें ? इस पार तो नित भ्रष्टाचार, बस अंत है अनन्त भ्रष्टाचार। धन है तो जन है जन है तो व्यपार है हम खाते जनता का, इतना खाया कर जाओगे कहां, छोड़ो इस फिलॉस्फी को करो कुछ काम, हसेगी दुनिया हसेंगे लोग, नाम है भ्रष्टाचारी अपना बस अंत है अनन्त भ्रष्टाचार। खाते जिस थाली में है, करते उसमे छेद हैं, लूट लुट कर थाली साफ़, बचा न कुछ अब तिनके तिनके बिखरे हैं बस जाने कब किसकी बारी, बस अंत है अनन्त भ्रष्टाचार।
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