इश्क
चाँद पर नज़्म लिखने चले थे, सुबह हो आई उसकी यादों की कसर मिटाते हुए वो याद आ गई सालों बाद महबूब को माशूका की चिट्ठी जो आई थी, भीगे अश़्क इत्मीनान से इश्क़ में अंतरलीन हो आई
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