क्या हो तुम ?
क्या हो तुम? मेरी हसरत हो, जूनून हो दिल का सुकून हो तुम, कभी ना मिटने वाली प्यास हो तुम तन्हाई की गलियों में मिलने की आस हो तुम, हिज़्र में तेरे सहम जाता है यह दिल तू आकर जल्द इससे मिल, मरहम हो दवा हो तुम तपती गर्मी में ठंडी सी फिज़ा हो तुम, गम जो तेरे हैं उनको मेरा पता दे सुकून से गले लगने का तू इक लम्हा दे , मेरी आरज़ू मेरा प्यार हो तुम जीत से भी मीठी खुद से ही मेरी हार हो तुम , हवा के झोंके के साथ यादों में आती बार बार हो तुम, क्या हो तुम? मेरी धड़कन, सांसे ,मेरा चैन हो तुम मदहोश करने वाले नैन हो तुम, पल पल क्यों मुझे करते बेचैन हो तुम? क्यों मेरे होकर भी मेरे नहीं हो तुम? जितना तुम्हे पाया है क्यों उतना ही दूर हो तुम ? क्यूंकि इस दिल का कुसूर हो तुम मेरा कल मेरा आज हो तुम दिल बैठ जाता है ज़ब होती नाराज़ हो तुम, बस इतना ही कहना है मेरी जिंदगी मेरा गुरुर हो तुम दिल की गलियों में क़ातिल मशहूर हो तुम। - सुमित भट्ट
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