रुको मित्र
समानिका छंद,7वर्ण होते हैं , 212 121 2 तू रुको अभी यहीं, जा रहे नहीं कहीं। व्यग्रता तजो यहाँ, काम क्या पड़ा वहाँ। जागते रहो जरा, जी अभी नहीं भरा। बोतलें उड़ेल लो , कंठ में धकेल लो । मित्र हो घनिष्ट तू, क्यूँ बना अशिष्ट तू। बात मान लो अभी, मौज प्राप्त हो तभी।। नरेन्द्र सिंह 08.02.2025
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
