मैं कौन थी, मैं भूल गई
मंजर कहां वादियों का राहें देखे देखे रात हुई, तिरछी जाती एक राह में मेरी मुझसे बात हुई पूछा उसने, क्यों ख्वाबों की खो जाने से आंसू चार बहा करते हैं? रात बची है, और चांद है क्यों दोनों यही रहा करते हैं? क्यों गुजराती इस तमस में राहे जाती तेरी हैं ? क्यों अभाग्य समझती है जीवन? जब श्रृंखलाएं सब मेरी हैं क्यों आंखों में होड़ नहीं? क्यों नब्जो में भी जान नहीं? क्यों मन की इस रणभूमि में उम्मीदे है मरी पड़ी? जा खोता है अस्तित्व तेरा क्या तलाशती यहां वहां? जा पहले खुद को ढूंढ के ला अब तुझ में तू है कहां? उसके इन सवालों ने, जो हृदय में था सब बोल दिया जब शब्द उत्तरहीन हुए, मैंने नब्जो पर जोर दिया कदम हटाते उस राह से, बातें मन को झंझोर गई, अब हाथ कापते थे मेरे मैं पीछे की ओर गई। उसे दिन बादल बिल्कुल स्थिर थें बागों में थी धूल पड़ी उसने आंखों में देखा जो मेरी मैं कौन थी मैं भूल गई मैं कौन थी मैं भूल गई।।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
