सोच
कभी-कभी मेरा सोचना भी कितना अजीब हो जाता है कभी-कभी मैं वह सोच लेता हूं जो शायद सोच में भी पूरा नहीं हो सकता और कभी-कभी कोई चीज सोचते सोचते पूरी हो जाती है पर क्या ऐसा हो सकता है जो सोचा हो पूरा न हो क्योंकि जो चीज मेरी सोच में आ सकती है उसको पूरा होने में भी समय नहीं लगता। ✍🏻अभिषेक नागर
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