उजालों का त्यौहार दिवाली।।
जिंदगी के जुगुनुओं की तलाश में फिर मन मार आया, अबकी दिवाली फिर घर से शहर आया। उजालों की कथा है अनकही उस अनकही कथा को ही तो ढूंढने मैं शहर आया। अबकी दिवाली फिर घर से शहर आया... रौशनी के जुगुनुओं ने तिमिर को छटाया, उम्मीदों के ज्वार ने अभी तक न हौसला गंवाया। आखिर कब तक खुशियों की बलि मैं चढ़ाता रहूं, मन ही मन ख्यालों के समन्दर में लहराता रहूँ। न अभी तक कोई किनारा आया, लो इस बार भी त्योहारों की बलि मैं चढ़ा आया। अबकी दिवाली फिर घर से शहर आया...!!
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