यह कैसा आतंक छाया है
यह कैसा आतंक छाया है! हर तरफ कोहराम ही कोहराम पाया है! कहकर मानवता के अधिकारी क्यो यह समझ न पाया हैं! अपनी तुच्छ लालच मे तूने देख सब नष्ट कर डाला हैं! अपने बल पर जीने वाले देख तूने अपनी बल बुद्धि गलत काम पर लगाया है! फिर भी कहता खुद को अगर इंसान तो सर्म कर क्या यही इंसान होने का सीख संतो ने हमको समझाया है! देख सबको एक समान कुछ अलग न तेरे पास तेरे जैसी ही पीड़ा होती सबको एक समान! अब सुन मेरी बात तेरे पास वक़्त है बहुत कम की करदे बहुत बड़ा सुधार पर हाँ अगर जगी है तेरे अंदर भी मानवता की आग तो रोक खुदको पहले करने से वीयर्थ काम! तभी तेरे होने का मिलेगा तुझे सही अधिकार! नही तो रह जाएगा तु भी बस पशु समान!
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