कौन?
इस उलझन को नज़ाकत से सुलझाए कौन? अक़्ल का भारी बोझ दिल से उठाए कौन? कौन करे खुले आसमान में तारों से बातें, और उस चाँद को अपना हमसफ़र बनाए कौन? कर भी ले अगर इरादा नज़्म-ए-इज़हार का, तो भी उनके नूर से आँखें मिलाए कौन? उनका मिज़ाज तो इश्क़ से भी नाज़ुक है, ऐसी नाज़िनी के तसव्वुर से दिल को समझाए कौन? उनके एक दीदार से ही साँसें ठहर जाती हैं, तो अपने जज़्बातों को लफ़्ज़ों पर लाए कौन? कौन कराए उनकी क़ैद से अपनी रिहाई, और इस मगरूर मोहब्बत से ख़ुद को बचाए कौन?
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