कांवरिया
मैं कांवरिया हूं लहू-लुहान पैरों से सूइया पहाड़ चढ़ा हूं जिसमें क्षमता है वो ही बम बनता है बड़े भाग्य से मिलता है अवसर आत्मविश्वास संतुष्टि पूर्णता का भाव मिलता है। मैं जब नौवीं में था तब पहली बार गया था तब से लगातार स्नातक तक जाता रहा हूं मैंने देखा है डॉक्टर, इंजीनियरिंग, प्रोफेसर को वो भी सहयात्री थे मेरे महानगरों से आ पैदल चले थे। अगर मैं कांवरिया नहीं होता था तो बहुत कुछ छुट जाता जीवन में जो पाया है अब तक मैंने जीवन यात्रा में वो न मिलता भटक जाता कहीं घोर अंधेरे में। शिव तो बस प्रतीक है बात अंतःकरण जागरण की है संकल्प संघर्ष सिद्धि के संगम में तन मन आत्म के पुनीत शुद्धि की है।
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