क्या अब बच्चों में बचपन रह गया
कभी मिट्टी में खेलते थे, बारिश की बूंदों से नाचते थे, आम की गुठलियों पर झगड़ते थे, पतंगों के संग सपनों को बुनते थे। अब स्क्रीन की चमक में खोए हैं, खिलौने भी डिजिटल हो गए हैं, कहानियों की जगह वीडियो ने ली, लोरियों को नोटिफिकेशन ने छीन ली। कभी गली की हंसी गूंजती थी, अब सन्नाटा किताबों से टपकता है, मां की गोद से ज्यादा पसंद आता, मोबाइल का छोटा सा ख्वाबों का घर। सवाल यही बार-बार सताता है — क्या अब बच्चों में बचपन रह गया है? या हमनें ही उनसे छीन लिया, खेलों का मैदान, पेड़ों का साया।
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