मेरे शहर....
ऐ मेरे शहर, मेरे हमनवा, फिर मुलाक़ात होगी,तेरी गली में फिर वही प्यारी सहर-ओ-रात होगी। तेरी फ़िज़ा की लज़्ज़तें महफ़ूज़ हैं इन साँसों में,हर इक नफ़स में तुझसे मेरी दिल-ओ-हयात होगी। गुज़रे हैं उम्र के सफ़र तेरे ही आँचल तले,तेरी गली की हर किसी मोड़ पे मेरी बात होगी। अब भी जुदा हैं फिर भी तुझसे रूह का रिश्ता तो है,यक़ीन कर—ये फ़ासले बस चंद रोज़ की बात होगी। जिस मोड़ पर बिछड़े थे हम, इक रोज़ वहीं मिलना है,उसी जगह से फिर हमारी इक नई शुरुआत होगी। लिखे हैं जज़्बात 'उत्पल' ने इस दिल से तेरे वास्ते,तेरे नाम हर शेर में इक मोहब्बत की सौग़ात होगी।
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