समय की अहमियत
संभवतः एक दिन सब मिल जाएगा, किंतु समय पर नहीं मिला तो, उसके मायने और मेरा उत्साह समाप्त हो जाएगा... बेवक्त मिली चीजें अर्थहीन महसूस होंगी, होंगी तो मेरे पास, किंतु नहीं रहेगा वो अहसास, वो अहमियत... क्योंकि चाह का सौंदर्य उसी पल में था, जिसे मैंने प्रतीक्षा की अग्नि में तपाया था। जब मन प्यासा था, तब ही वह अमृत था, अब तो वही अमृत भी फीका लगेगा, क्योंकि तृप्ति से पहले मिली चीज़ कभी संतोष नहीं देती। जो देर से आता है, वह अपने साथ थकान लाता है, और मैं शायद तब तक वो “मैं” भी न रहूं, जो आज उसे पाने की तीव्रता रखता है। समय से पहले मिली चीज़ अहंकार बनती है, और समय के बाद मिली चीज़ — बस एक याद। समय बड़ा संवेदनहीन न्यायाधीश है, देता तो है सबको, पर जब मन की ऋतु बीत जाती है। तब जो फूल खिलते हैं, उनमें न सुगंध रह जाती है, न स्पर्श का अर्थ। शायद इसीलिए ऋतुएँ भी लौटकर आती हैं, पर बीते मौसम का एहसास कभी नहीं आता। और इंसान — वही तो सबसे बड़ी भूल करता है, वह सोचता है मिल जाना ही सब कुछ है, पर असल में, समय पर मिलना ही वरदान है।
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