स्वाभिमान की धरती।
आ तो गई मैं इस शीशे के शहर दिल्ली में, पर मेरी सांसों में अब भी बसती है बिहार की मिट्टी की सुगंध, जहां प्यार व्यापार नहीं एक पवित्र बंधन है, जहां हाथ पकड़ने से पहले नियत पक्की होती है, जहां रोटी सादी ही सही पर रूह कभी भूखी नहीं होती। दिखावे के इस दुनिया में कहां से लाऊं अपने लोग, यहां जज़्बात भी लगते हैं महंगी चीजों के रोग। हमारे यहां आंखों की नमी भी दुआ बन जाती है, यहां मुस्कान भी नकाब पहनकर आती है। इस चकाचौंध भरी दुनिया में ख्वाबों का बाज़ार लगता है, हर हाथ मिलाने वाला शख्स अंजान सा लगता है। यहां रिश्तों पर शर्तो के फरमान रखे जाते हैं, हमारे यहां तो नजरों से भी हाल समझ जाते हैं। यहां "मैं" बोलो तो शान और "हम" बोलो तो बेकार, अपनी ही बोली पर उठते सवाल हज़ार। एक कपड़ा दुबारा पहनो तो नज़रे बदल जाती है, "लोग क्या सोचेंगे" की फिज़ा फिर ढल जाती है। यहां बिहार और बिहारी एक गाली है, तो सुनिए- हैं हम बिहारी और यही घमंड है हमारा, भगवान से दुआ है यही संसार मुझे मिले दुबारा, जहां सादगी में शान और सच्चाई में प्यार, उसी माटी की बेटी हु बिहारी इज्ज़तदार। - साक्षी शर्मा।
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