यादें
सुनहरे गीत गए थे जिनके साथ उनकी आवाज सुनने को आज तड़प उठते है यह कान। वैसे तो उन्हीं में बस्ती है हमारी जान, और लिख बैठे है उनके नाम हम अपनी आन बान और शान करके अपने सपने दान और कुर्बान। पर जिनको था हमने अपना भगवान मान वहीं कर बैठे यह ठान कि हम नहीं बन सकते एक खानदान तो हम भी चल दिए बढ़कर अपनी उड़ान गहन के दूसरे पार भूलकर उनके गान।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
