तुम्हें बाँधना नहीं चाहता मैं
✍️ ईश्वर ढकाल तुम्हें बाँधना नहीं चाहता मैं, पर ये दिल है कि आज़ाद भी नहीं रहता… तुम समझती हो शायद कि मैं तुम्हें समझता ही नहीं, पर कैसे कहूँ — तुम्हारी हर खामोशी मुझे पूरी रात जगाए रखती है। मैंने तुम्हारी मुस्कान देखी है, पर उसके पीछे छुपी थकान भी देखी है। सबको तुम्हारी चमक दिखती है, मुझे तुम्हारा संघर्ष दिखता है। तुम दिन भर मज़बूत बनकर लड़ती हो, हालातों से, लोगों से, किस्मत से… और रात को चुपचाप अपने आँसुओं को खुद ही पोंछ लेती हो। तुम्हारी मेहनत की लकीरें तुम्हारे हाथों में नहीं, तुम्हारी आँखों में दिखती हैं। हर अधूरी नींद, हर टूटा सपना, हर बार गिरकर फिर से खड़ा होना — मैंने सब महसूस किया है। मैं तुम्हें रोकना नहीं चाहता, क्योंकि तुम्हारी उड़ान तुम्हारी मेहनत से बनी है। मैं बस डरता हूँ — इतना मत थक जाना कि खुद को ही भूल जाओ। तुम सोचती हो मैं चुप रहता हूँ, पर मेरी चुप्पी में तुम्हारे लिए हजार दुआएँ छुपी होती हैं। तुम्हारा संघर्ष मुझे रुलाता है, और तुम्हारी हिम्मत मुझे तुम पर और भी फख्र कराती है। मैं तुम्हें कैद नहीं करना चाहता, बस इतना चाहता हूँ — जब दुनिया तुम्हें समझ न पाए, तो तुम जानो… कोई है जो तुम्हारी मेहनत, तुम्हारे आँसू, तुम्हारी लड़ाइयाँ सब देखता है… और चुपचाप तुम पर मरता है।
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