बुझती हुई परंपरा और प्रश्न।।
निज ग्राम की प्राण प्रतिष्ठा का, आज हुआ मर्दन है, जयसिंहपुर ग्राम में बुझी अग्नि नहीं, विश्वासों का दहन है। धिक्कार है उस एकता के दंभ पर, जो सोशल बातों में तो प्रखर थी, पर सत्य की घड़ी में मौन रही। जिसने अग्नि की लौ नहीं, अपने पूर्वजों की स्मृतियों को बुझा दिया। राख नहीं उड़ी इस बार, उड़ा है आत्मसम्मान! और उस धुएँ में घुट रही है ग्राम-गौरव की अंतिम श्वास। होलिका दहन तो इस बार नहीं हुआ, पर दोषारोपण से क्या होगा? अंगारों को बाहर नहीं, अपने अंतर्मन में खोजा जाए। क्योंकि यह प्रथम अवसर अवश्य है, पर कारण नवीन नहीं; बीज तो वर्षों पूर्व ही बोए गए थे, आज केवल उनका फल प्रकट हुआ है। जो आज शब्द ज्ञान के तीर चला रहे हैं, वे भी निर्दोष कहाँ ठहरे? कहीं न कहीं उसी कथा के मौन सह-लेखक रहे हैं। गाँव की खुशहाली, राजनीति की भेंट चढ़ा दी गई; स्वार्थ की आँधी में संस्कारों की लौ बुझा दी गई।
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