"दूसरों की बेचैनियों में खोई
"दूसरों की बेचैनियों में खोई मैं" रातों की चादर में चुपचाप जागती हूँ, दूसरों की बेचैनियों को अपने सीने से लगाती हूँ। जिन्हें चाहा, उनके दर्द का भार, मेरे सपनों की दुनिया में करता प्रहार। क्यों उनकी आहट मेरे दिल को चीरती है? क्यों उनकी खामोशी मेरी नींद को छीनती है? जो मैं चाहती हूँ, वह चैन से सो सकें, पर उनकी तकलीफ़ मेरे ख्वाबों को रोक सके। उनकी पीड़ा मेरी रूह तक पहुँचती है, जैसे उनकी तड़प मेरे वजूद में बसती है। क्या यह प्रेम का रिश्ता है, या आत्मा का मेल? जो हर आँसू, हर दर्द को बनाता मेरा खेल। मैं सो नहीं पाती, क्योंकि उनकी बेचैनी मेरी है, उनका दर्द, जैसे मेरे दिल की सच्चाई है। क्यों उनका दुख मेरी सांसों में बसा है? क्यों उनकी तकलीफ मेरा रास्ता धुंधला सा कर गया है? शायद यही है प्रेम की असली परिभाषा, जहां दूसरों का दुःख ही बनता हो दिल की भाषा। मैं उनकी तकलीफ़ से टूटती भी हूँ, फिर भी हर बार उन्हें संभालने को उठती भी हूँ। इस बंधन का दर्द भी मीठा है, यह बेखुदी भी तो अनोखी रीता है। क्योंकि जिसे चाहो, उसके दुःख का एहसास, बनता है प्रेम का सबसे गहरा विश्वास।
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