"मंजिल से वफा"
रास्ता अब खुल चुका है, पर हर मोड़ पर काँटे बिखरे हैं, हर दिन नई अग्निपरीक्षा है, हर साँस में संघर्ष घुले हैं l कभी मन थक जाता है, तो कभी आशा डगमगाती है, पर पीठ फेरना मंज़िल से, मानो आत्मा को ठुकराना है ।
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