साँसों का फागुन
तुम फागुनी बयार बन कर आना, मैं पलाश सा दहक जाऊँगा, तुम मौन अधर ले आना, मैं अपनी नज़्मों से तुम्हें सजाऊँगा। अबीर के बादलों में जब हमारा अक्स धुंधला सा होगा, उस रूहानी मंजर में, मैं सिर्फ तुम्हारा ही हो जाऊँगा। ये जो सुर्ख गुलाल है, ये महज़ एक रंग नहीं है, मेरे तपते हुए विरह का सुलगता हुआ जवाब है। तुम्हारे सजल नयनों में जो ये संदली चमक है, मेरे हर अनकहे सवाल का मुकम्मल ख़्वाब है। चलो आज इस कच्ची उम्र के पक्के रंगों में घुल जाएँ, दुनिया की रवायतों से दूर, एक-दूजे के वजूद में मिल जाएँ। न कोई पराया रहे, न कोई सरहद बीच में आए, इस होली हम कुछ इस तरह एक-दूजे में खिल जाएँ। बाज़ारों में मिलने वाले रंगों की उम्र बहुत कम होती है, मुझे तो तुम्हें उस रंग में रंगना है जो रूह तक उतर जाए। दुआ है कि हमारे इश्क़ की ये रंगीन सिहरन, पूरी उम्र, एक भीगी हुई खुशबू की तरह साथ रह जाए।
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