कुण्डलिया
शीर्षक--गरिमा गरिमा अपनी शान है, जीवन भर का मान। कतई कभी गिरे नहीं, सदा रहे यह ध्यान।। सदा रहे यह ध्यान, सुयश जग में है मिलता । करो वही सब काम, नाम हो जिससे खिलता ।। जिसका चरित्र श्रेष्ठ, जगत में उसकी महिमा। नर वह बनता पूज्य, रखे जो अपनी गरिमा।। मानो गरिमा रत्न है, इसका रखना ख्याल। इसको यदि तुम खो दिया, होगा मन बेहाल।। होगा मन बेहाल, जगत में मान घटेगा। चलना बचकर राह, नहीं तो दाग लगेगा।। अगर चाह सम्मान, यही जीवन भर जानो। रहना बनकर नेक , श्रेष्ठ गरिमा को मानो।। गरिमा को कायम रखो, भले समय प्रतिकूल। ख्याल रखो संस्कार को,इसे नहीं नर भूल।। इसे नहीं नर भूल,करो प्रण बस अब इतना। कतिपय करो न चूक,भले हो साजिश जितना।। ऊँचा रखना भाल,कर्म हो तनिक न लघिमा। सदा मिले तब मान,अगर कायम हो गरिमा।।
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