कल का चक्रव्यूह
कल का चक्रव्यूह अलार्म बजा सुबह-सुबह, मन बोला "आज नहीं!", कंबल में घुस कर सोचा, "थोड़ा और सो लें, सही!" काम पड़े हैं ढेरों सारे, फ़ाइलें कर रहीं इंतज़ार, पर सपनों की दुनिया से भला, कौन करे इंकार? योजना बनी थी रात को, "कल से सब होगा ठीक," "सुबह उठेंगे जल्दी-जल्दी, न कोई होगी लीक." पर जब आई सुबह प्यारी, चिड़िया गाने लगी राग, मन ने फिर फरमाया, "थोड़ा और ले लो फाग!" ईमेल देखे, फ़ोन उठाया, सोचा "बाद में कर लेंगे," Netflix पे नई सीरीज़, "पहले वो देख लेंगे." किचन में बर्तन पड़े हैं, कपड़े भी हैं ढेर, पर कौन उठाए ये सब, जब दिल मांगे बस ढेर? शाम हुई, सूरज ढला, तारों की आई बारात, काम वहीं के वहीं धरे हैं, बीत गई एक और रात. फिर सोचा, "अब तो पक्का, कल से ही लग जाएंगे," और इसी 'कल' के चक्कर में, हम सब फंसे जाएंगे. ये 'कल' बड़ा मायावी है, कभी आता ही नहीं, जिंदगी की दौड़ में ये, हमें बस भटकाता ही. तो मित्रों, अब से छोड़ो ये, 'कल' का बहाना, जो करना है आज करो, वरना फिर पछताना!
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