"खामोशी के लम्हे"।
सारा दिन साथ बैठे रहते थे, आज एक झलक के लिए तरस रहे हैं। वो पल जो हंसी में गुजरते थे, अब खामोशी में ढल रहे हैं। कभी बातों का सिलसिला जो चलता था, अब वो लम्हे छुप-छुप कर गुजर रहे हैं। दिल की करीबियां थी, फासले कहाँ थे, अब दूरियों के साए में सिमट रहे हैं। वो जो नजरें मिलते ही मुस्कुरा जाते थे, आज उन आंखों से हम बिछड़ रहे हैं। सारा दिन साथ बैठे रहते थे, अब एक झलक के लिए तरस रहे हैं। -मन की चिंगारी (Word's by Nisarg)
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