मुझे तो सृजन करना है+
न यश,न कोई पुरस्कार की चाहत, न तो लेखन का व्यापार करना है; मैं सरस्वती का हूँ भक्त पुजारी, मुझे सिर्फ कलमकार ही रहना है। आंखें, अंगुलियां और दिमाग सभी, शैथिल्य नहीं हो जब तक जीवन में; अनवरत,अहर्निश और अथक तब तक, रहूँगा रत मैं कविता के सृजन में। दिखेगा जो,वही लिखूंगा हू-ब-हू, कतिपय परिकल्पना मुझे करना है; बेबाकी से सत्य को उकेरेंगे , आखिर क्यों किसी से मुझे डरना है। कर प्रहार हास्य-व्यंग्य कटाक्ष से ही जोश भाव को जन जन में भरना है; हो मनोरंजन मेरी लेखनी से, मुझे तो वैसा ही सृजन करना है। आए जागरूकता समाज में भी स्पष्ट संदेश की रचना करना है; मां सरस्वती की कृपा दृष्टि जब तक तब तक सृजन मुझे करते रहना है।। नरेंद्र सिंह,गया 12.12.2023
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