मन
मन, मरीचिका का एक वितान, अव्यक्त कामना का गहन प्राण। कभी प्रलोभन का मद चढ़ाए, कभी मोहजाल में उलझाए। विकल्पों का अरण्य रचता, कुंठा का विषबीज भी बोता। आकांक्षा का आलोड़न लाए, संतुलन से विमुख कर जाए। परंतु, वही मन जब संयम थामे, धैर्य और साधना के रथ पर सामे। विवेक का प्रदीप जब जलता, तमस का आवरण तत्क्षण ढलता। मन भटकाए, मन ही थामे, संसार के सब दृश्य दिखलाए। जो इसे वश में कर पाए, वही आत्मा का सत्य जान पाए। मन, दिग्भ्रमित भी, मार्गदर्शक भी, विनाश का साधन, और सृजन का ऋषि। इस चंचलता का जब अंत जानोगे, संसार का सत्य तभी पहचानोगे।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
