मुद्दते बीत गई तुझे भुलाने में
मुद्दते बीत गई एक तुझे भुलाने में, जिसके लिए तिनका जुटाता था किसी जमाने में। आज वक्त ने बदल सी दी है फलसफा, ना जाने क्यों उसके लिए आज भी हूं मैं वफ़ा। जमाने में कौन मुझसे ये जवाब करेगा, जब भी पूछेगा वो मुझसे, खुद से ही सवाल करेगा। चाह कर भी मैं ना बता सकता उसका पता, क्योंकि आज भी लोग लगे हैं मुझे फ़साने में।। ये सर्द रात, ये ठंडी हवाएं ना जाने कुछ बात करती है ये कोहरे, ये घने अंधेरे, ये मौसम फरियाद करती है। धीरे से कानों में ये आकर ये फिर कहती है, अभी अभी तो आए ही इस जमाने में, क्यों इतनी जल्दी है उसे भुलाने में।।।
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