रिश्तों का विपणन
दौलत का बहता दरिया किनारे तो बनाता है, मगर रिश्तों के बीज को पानी नहीं दे पाता है। मोहब्बत वो पुराना दरख़्त है, जो जड़ों से जीता है, छांव से पहचाना जाता है। शादी कोई क़िला नहीं, जिसे सोने से ढाला जाए, ये तो मिट्टी का घर है, जो विश्वास से बनाया जाए। दौलत की चाशनी में रिश्ते घोलने से, वो सिर्फ़ मीठे छल बनकर रह जाते हैं। दिल वो कच्ची ज़मीन है, जो सच की बारिश मांगता है, जहाँ झूठ की धुंध हो, वहाँ दरारें तो आ ही जाती हैं । जब सपनों की चादर पर सिक्कों का वज़न रखते हो, सुकून की नींद काहां आएंगी, बिस्तर को बिखरने का मोहजत होने से रोक काहां पाएंगी | पैसे की चमक वो मृगतृष्णा है, जो प्यास बढ़ाती तो है, पर पानी नहीं बरसाएंगी। जहाँ झूठ की धुंध हो, वहाँ दरारें तो आएंगी | रिश्तों का इत्र दिल की कस्तूरी से बनता है, दौलत के शीशे में उसका असर नहीं जमता है। तो ठहरो, समझो, और अपनी आत्मा से पूछो, क्या सच में इस सौदे में जीत पाए हो..? क्योंकि जहाँ बिकते हैं सपने और दिलों के हाल, वहाँ हर कहानी का अंजाम होता है सिर्फ सवाल..।
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