राम -काग लीला
राजा दशरथ के मणिमय आंगन में, कनक महल के विशाल प्रांगण में। रामलला संग खेल कर रहा था काग, इधर -उधर कूद-कूद कर भाग-भाग। रामलला कभी यूँ ही फुदक-फुदक , कभी यत्र-तत्र यूँ ही कूदक- कूदक। थूल -थूल ठुमुक -ठुमुक उछल रहे थे, खिलौना समझ,पाने को मचल रहे थे। करधनी व नूपुर से निःसृत मधुर निनाद, सुन सुन धुन ,मस्त झूम रहा था काग। काग पकड़ने को प्रभु की उत्कट चाहत, आंगन में फिसल,हो रहे थे अति आहत। काक न आ रहा था रामलला के हाथ, मज़ाक कर रहा था वो प्रभु के साथ। प्रभु को वो छका रहा था,थका रहा था, रामलला को अति मज़ा,चखा रहा था। जूठन चुनना तो मात्र उसका बहाना था, उसे तो प्रभु से अपना मन बहलाना था। जिनके दर्शन को संत जप करते दिनरात, उनका दर्शन काग करते रहता था साक्षात। धन्य धन्य अहोभाग तेरा हे काग महाराज, त्रिलोकीनाथ को भी तुम नचा रहा नाच।। नरेंद्र 17.04.2023
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