दोस्ती के याद मे.
दोस्त मिला था हसमुख सा ग़म मे साथ वो होता था दोस्त गया था छोड़ के जब पास मेरे वो रोया था बारबास का दिन था प्यार हसकर बीत जाता था कभी - कभी हम दोनों मे मन मुटाव भी होता था साथ मे थे सौम्या मैडम सारा काम कर देते थे उसका जो काम न होता उसमे मे भी हाथ बटाते थे बिच - बिच हम दोनी को ब्रियानी का शोक चढ़ता था न जाने क्यों अपने आप कदम उसी और बढ़ता था परमानिक होटल अपना है मान यही हम चलता था रायता और बिरियानी साथ धनिया चटनी मिलता था रांची मे जो दिन काटे दिन बड़ा सुहाना था कुछ पल के दोस्ती मे लगा दोस्त मेरा पुराना था आज सब कुछ छोड़ आये हम याद अभी भी आता है कभी सायन से, कभी मैडम से call मे बात होता है call मे दिन वो मिल नहीं सकता सब कुछ बदल जायेगा कल सब कहीं और होगा समय कहाँ मिल पायेगा डॉ सौम्या भी चली गई ऊँचे मुक़ाम पाने को ठहर के कहीं क्या हो वक़्त है बह जाने को वक़्त बचे ने किसी के पास ये दौर भी आएगा मिलना जुलना अलग बात है बात भी न हो पायेगा दुआ है ईश्वर से, सबको सफलता शीघ्र ही मिल जाए और कभी ऐसा दिन आये हम सभी फिर मिल पाए कवि - राहुल पिंडराहात
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