अवसर
कूच भी किया न था की हाय युद्ध बंद हुआ तैयारी धरी की धरी रही अवसर देखो फिसल गया। मौका दुबारा मिलता नहीं जो छुट जाता है वो खो जाता है जीवन की जटिलता में समझो दुबारा समय न भाव मिलता है। एक सिपाही से पूछो की अब उसके अरमानों का क्या होगा जिसके मन में उन्माद आ चुका उसके फ़ौलादों का क्या होगा। मिलते मिलते ही उपलब्धि देखो हाय कैसे विलुप्त हुई बस एक दिवस में ही देखो रेत कैसे हाथों से फिसल गयी। जो जब होना होता है तभी होता है नियति के आगे प्रयास भी विफल होता है द्वन्द चला आ रहा सदियों से फिर भी प्रयास कब भाग्य का कहा मानता है। सिपाही निराश होते नहीं नई तैयारी करते हैं अगले कूच के लिए हरदम तैयार रहते हैं न जाने कब कहां से बुलावा आज जाए हर समय तन मन और समान तैयार रखते हैं।
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