२५/०८/२०२४
आज साल हो गए,गए तुम्हें यहां से, क्या आज भी तुम मुझे याद करती हो? मैं तो जनता भी नहीं क्या तुम करती भी हो, अक्सर चाॅंद को देखकर लोगों को याद आता है उनका हमसफर, मैं अक्सर तुम्हे देखने को आँखें बंद कर लेता हूॅं, जानता हूॅं मैं चाॅंद की खूबसूरती कुछ भी नहीं, पर मैं जानता ये भी कि चाॅंद धरती पर कहाॅं? यहाॅं हो भी चाॅंद तो क्या हो फिर खुशनुमा, पास चाॅंद हो पर पास फिर तुम कहाॅं? चाॅंद की शीतलता का फिर मैं क्या करूॅं? चाॅंद आखिर तुमसा वो प्रेम देगा कहाॅं? कहाॅं चाॅंद में वो बात जो कि तुम में है, चाॅंद में तुम जैसी वो कोमलता कहाॅं? कब कहता है चाॅंद मुझसे की वो मुझे चाहता है, कब मैं कहता हूॅं चाॅंद से की चाहता हूॅं मैं उसे, मैं कहूॅं भी तो क्या कहूॅं वो आखिर चाॅंद ही तो है, मैं कहता हूॅं हर पल कहूंगा चाॅंद में तुमसी बात कहाॅं?।।
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