जिंदगी ....
ज़िन्दगी कब खिलौनों से छूट कर,प्रतियोगी परीक्षा के किताबो में फस गई पता ही नहीं चला। ज़िन्दगी कब बचपन में आज़ादी ढूंढते-ढूंढते प्रतियोगी परीक्षा के किताबो की बंदिशों में फस गई पता ही नहीं चला। ज़िंदगी कब कोरे कागज़ की कश्ती बनाते-बनाते,नोट्स बनाने में बीत गई पता ही नहीं चला। ज़िंदगी कब कहानी सुनते-सुनते, सुनाने वाली बन गई पता ही नही चला। ज़िंदगी कब इतनी आसान सी इतनी कठिन बन गई पता ही चला।
·0 views·May 24, 2022
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