"गूढ़ स्वरों का सन्नाटा"
सबको सहानुभूति देने वाली तुम क्या जानती हो खुद को— कि क्या हो तुम? लोगों को तो ऐसे दिखलाती हो जैसे तुम्हें कुछ हुआ ही ना हो। क्या तुम अपना सारा दर्द और दुख छुपाती हो? मैं जानती हूं तुम्हें, अरे सुनो, मैं जानती हूं तुम्हें— मैं हूं तुम्हारा स्वयं। तुम कभी न थीं ऐसी जो इतनी दृढ़ बन गई हो। मैं जानती हूं तुम्हें— कि सबको खुश करके स्वयं को खुश पाती हो। अच्छा लगता है तुम्हें खुद को दूसरों की खुशी में मुस्कुराते देखना। किया है और करना भी सदा, मगर जान लो तुम कि ना खो जाओ इस भंवर में, जो तुम्हें कैद कर ले अपने भीतर। मैं जानती हूं सब कि करोगी तुम नाम रोशन अपने स्वजनों का, करोगी तुम अपने देश का, अपना, और बनोगी एक मिसाल— उन नौजवानों के लिए जो अपना पवित्र जीवन नष्ट कर रहे हैं। आशीर्वाद है कि तुम जो चाहो तुम्हें सदा मिले। सदैव करो सत्कर्म और धन्यवाद करो उस परमात्मा का— जिसने तुम्हारी रचना की और तुम्हें इतना संवार दिया। अंत समय में पकड़ लेना डोरी उस परमात्मा की, और चल पड़ना मोक्ष की ओर...
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