समर्पण
निशब्द है जो तुम्हारे शब्द मै समझ रही हूं , निसंदेह तुम्हारे लिए सबसे उलझ रही हूं । हर खूबी ओर हर खामी को खुद में परख रही हूं । कुछ तो खासियत है तुममें ऐसी कि , तुम्हारे बिन कहे मै खुद को बदल रही हूं । जी रही हूं हर पल , जैसे , आखिरी लम्हे हो मेरे तुम्हारे साथ । कुछ इस कदर , तुम्हारे प्यार को मैं जीत रही हूं । और कभी दाग न लगाना मेरे प्रेम पर तुम , अपना सर्वस्व तुम्हे सौंपकर इस रिश्ते को सींच रही हूं।
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