नेत्रहीन
ये किस मोड़ पर मैं आके हु यूँ पड़ा, विध्वंस की आंधी में नेत्र खोले खड़ा, विपरीत विपत्तियों के मध्य धूमिल छवि मेरी, जैसे किसी कीचड़ में कोई स्वर्णिम पुतला जड़ा। अस्त्तित्व मेरा विभोर , मुझपे आश्चर्य करे, सारे कर्म दनुज के, मानवता से हु परे, मेरी विडंबना ये की मैं सत्य के विरुद्ध चला, माया क्या भोग क्या, मृत्यु भी मुझसे डरे। अहंकार है या मेरी मूर्खता का ये प्रमाण है? विश्व में 'अमन' तू ही नही सबसे महान है, चोला ओढ़ तिरस्कार का आगे जो बढ़ चला, केवल तरु है,नाकि तू महीधर के समान है। निंदा की चिंता नहीं, न सम्मान का प्रलोभन, स्वयं की प्रभुता बढ़के, दूजों पे दोषारोपण, अग्रसर ही 'अमन' रौंदे चला सत्यार्थ को, मर मिटा वसुधा में, धुंधला 'अमन' का लोचन।
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