एक अनकहा एहसास
एक सफ़र था, कुछ यादें नई, एक केबिन, पहाड़, और ठंडी हवा चली। हम सब थे वहां, हंसते-खेलते, पर मेरा मन कहीं और ही गुमसुम था। काम ख़त्म कर मैं जंगल गई, सोचा— ख़ुद से मिलूं, जो दिल कह न सका। ख़ामोशी में भटकती रही अकेली, पर शायद तुमने मेरी तन्हाई पढ़ ली। तुम आए चुपचाप, बस इतना पूछा— "सब ठीक है?"— जैसे सच में फ़िक्र थी। उस लम्हे में लगा, कोई अपना है, कोई... जो मेरी ख़ुशी की वजह है। रात को छलक गईं कुछ बातें, शराब में घुल गईं अनकही यादें। मैं सो गई चुपचाप अकेली, पर तुमने ढूंढा... ये जानकर दिल पिघल गया। कौन करता है इतनी परवाह यूं ही? शायद कोई, जो रूह से जुड़ गया हो। अब ख़ुद से पूछती हूं हर रोज़, कहीं ये एहसास... मोहब्बत तो नहीं?
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