भूलना चाहती हूँ..
ये जो तेरी तिजारत है..,न जाने इसमें कितने ही रिवायत हैं ...कहते हो ,मुझसे मोहब्बत का तालुक है.. की कहते हो मुझसे मोहब्बत का तालुक है..., फिर भी साथ क्यूँ छोड़ जाते हो..? एहतिताज न कर मेरे बातों से.. कयाम कर अपनी वादो पर... तशरीह न पूछ मेरे इश्क़ की....हाँ अदावत हो जायेगी...,, तबस्सुम मेरी छीन जाती है, आँखे भर आती है..., जब भी तेरी याद आती है..... ओह!! जालीम तेरी ये यादों का जफा... कर देगी मुझको फिर से फना... ऐसे न साथ छोड़, ऐसे न साथ छोड़... बस इक बार रुक जाओ .... मोहब्बत न सही..अदावत का वास्ता तो देते जाओ..., ख्यालों की झंकार मिटाते जाओ ..इश्क़ की नूर बुझाते जाओ अब वापस आ ही गये हो तो..मुझे मेरी तबस्सुम देते जाओ... भिंग जाती हूँ तेरी यादों की सावन में.. जाने कोई क्यों नही भाता अब इस आँगन में... तुझसे रुखसती भी न ले पाती हूँ...तेरी आहट भी न भूल पाती हूँ... फिर यही सोचती हूँ...तुझे भूल क्यू नही पाती हूँ???
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