क्यों
मंजर कहां वादियों का रहे देखे देखे रात हुई , तिरछी जाती एक राह में मेरी मुझसे बात हुई पूछा उसने, क्यों ख्वाबों की खो जाने से आंसू चार बहा करते हैं? रात बची है, और चांद है क्यों दोनों यही रहा करते हैं? क्यों गुजराती इस तमस में रlहे जाती तेरी हैं ? क्यों अभाग्य समझती है जीवन? जब श्रृंखलाएं सब मेरी हैं क्यों आंखों में होड़ नहीं? क्यों नब्जो में भी जान नहीं? क्यों मन की इस रणभूमि में उम्मीद है मरी पड़ी? जा खोता है अस्तित्व तेरा क्या तलाशती यहां वहां? जा पहले खुद को ढूंढ के ला अब तुझ में तू है कहां? - Diksha Tiwari
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