नव वर्ष
नई किरने नए कोपल नई उम्मीद लाए हैं, जहां एक वर्ष है छूटा नयालिंगन लगाए हैं। बहुत सीखा, सिखाया है साथ सबका निभाया है, मगर दिल की कहें सच में कभी ना साथ पाए हैं। बनो खुद की तुम्ही लाठी बीतता साल बतलाया, जो है सीखा वही लिखकर नई कविता बनाए हैं। आज भी तुम और कल भी यही कहकर ठगा सबने, जरूरत है राम हो तुम वरना रावण कहा सबने। जो सीखा साल भर हमने सिखाने साथ लाए हैं, जहां एक वर्ष है छूटा नयालिंगन लगाए हैं। नई किरने नए कोपल नई उम्मीद लाए हैं, जहां एक वर्ष है छूटा नयालिंगन लगाए हैं। ✍️रुद्रा उत्कर्ष शुक्ल
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